Wednesday, March 17, 2010

वो रोज मरती रही


र कर सवाल खुद से
वो रोज मरती रही,
अपने दर्द को
शब्दों के बर्तन भरती रही,

कुछ लोग आए
कहकर कलाकारी चले गए
और वो बूंद बूंद बन
बर्तन के इस पार झरती रही।

खुशियाँ खड़ी थी दो कदम दूर,
लेकिन दर्द के पर्दे ने आँखें खुलने न दी
वो मंजिल के पास पहुंच हौंसला हरती रही।

उसने दर्द को साथी बना लिया,
सुखों को देख, कर दिए दरवाजे बंद
फिर सिकवे दीवारों से करती रही।

रोज चढ़ता सूर्य उसके आंगन,
लेकिन अंधेरे से कर बैठी दोस्ती
वो पगली रोशनी से डरती रही।

इक दिन गली उसकी,
आया खुशियों का बनजारा,
बजाए इक तारा,
गाए प्यारा प्यारा,
बाहर जो ढूँढे तू पगली,
वो भीतर तेरे,
कृष्ण तेरा भीतर मीरा,
बैठा लगाए डेरे,

सुन गीत फकीर बनजारे का,
ऐसी लगन लगी,
रहने खुद में वो मगन लगी
देखते देखते दिन बदले,
रात भी सुबह हो चली,
हर पल खुशनुमा हो गया,
दर्द कहीं खुशियों की भीड़ में खो गया।

कई दिनों बाद फिर लौटा बनजारा,
लिए हाथ में इक तारा,
सुन धुन तारे की,
मस्त हुई,
उसके बाद न खुशी की सुबह
कभी अस्त हुई।

Sunday, March 14, 2010

प्रायश्चित

अक्षित अपने माता-पिता का एकलौता बेटा था ! उसके पिता शहर के डिप्टी कमिश्नर थे ! एक आलिशान बंगला , गाड़ियाँ सब सुख- सुविधाएँ उनके पास थी ! लेकिन अक्षित के पिता बहुत ही सुलझे हुए व समझदार थे!उन्होंने कभी भी अक्षित की फिजूल जरूरतों को पूरा नहीं किया था ! वे उसे बहुत प्यार करते थे परन्तु वे नहीं चाहते थे की ज्यादा लाड -प्यार और अधिक जेब-खर्ची के कारण व बिगड़ जाये ! वे हमेशा उसे लगन से पढाई करने के लिए कहते ! लेकिन अक्षित का मन बिलकुल भी पढाई में नहीं लगता था ! वह हमेशा दिए गए गृह-कार्य से जी चुराता ! कई बार कार्य न होने के कारण उसे अध्यापकों की डांट खानी पड़ती लेकिन सभी उसके पिताजी का लिहाज कर चुप हो जाते ! अक्षित को बाजार की गन्दी चीजें खाने का बहुत शोंक था ! अपनी इस गन्दी आदत के कारण व कई बार बीमार हो चूका था ! इसलिए उसके माता-पिता उसे बहुत समझाते व फालतू पैसे भी नहीं देते थे ! घर में नौकर -चाकर होने के बावजूद व घर से स्कूल बस में जाता ! क्योंकि उसके पिताजी उससे कड़ी- मेहनत करवा लायक बनाना चाहते थे ! एक दिन वह घर से स्कूल बस में जा रहा था ! उसके पिताजी ने उसे किराए के लिए पांच रूपए दिए थे ! उस दिन बस में बहुत अधिक भीड़ थी ! वह काफी देर तक पैसे हाथ में लेकर कंडेक्टर का इंतज़ार करता रहा ! कुछ देर बाद कंडेक्टर सबकी टिकते काट अपनी सीट पर जाकर बैठ जाता है ! अक्षित जब यह देखता है तो उसके मन में यही ख्याल आता है की वह जाकर टिकट ले आये ! लेकिन तभी उसका लालची मन उसे कई तरह के पर्लोभ्नो में फ़सा देता है ! वह चुप- चाप वंही बैठ जाता है और सोचता है की इसमें मेरी क्या गलती ! वह कंडेक्टर भैया खुद ही मेरे पास नहीं आया ! इतने में बस रूकती है भीड़ के साथ वह भी जल्दी से उतर जाता है ! स्कूल पहुँच उसकी ख़ुशी का ठिकाना नहीं रहता ! वह अपने दोस्तों को भी अपनी समझदारी का किस्सा बड़े गौरवपूर्ण तरीके से सुनाता है ! वे उसे समझाने की बजाय और अधिक उकसाते हैं की अरे तुम प्रतिदिनं ऐसा कर कितने पैसे बच्चा सकते हो ! उस दिन वह अपने दोस्तों के साथ बड़े मजे से पकोड़े खता है ! अब तो उसे इसमें आनंद आने लगता है ! प्रतिदिन कभी चाट , कभी गोल-गप्पे, ऐसा करते - करते पांच दिन निकल आते है ! अब वह इतना अधिक आदि हो जाता है की उसे खुद पर शर्मिंदगी महसोस होती है की यह काम उसने पहले क्यों नहीं किया ! सुबह वह रोज की तरह तैयार हो जब बस में चदता है तो पहले की तरह ही टिकेट नहीं लेता ! वेसे ही बस रूकती है जेसे ही वह अपने स्टॉप पर उतरने लगता है बस में चेकर आ जाते हैं ! सबकी टिकटे देख जब वह अक्षित से टिकेट दिखने को कहते हें तब वह सर हिला मना कर देता है ! वे बस को रुकवा उसका नाम व पिताजी का नाम पूछते है जब उन्हें पता चलता है की वह डिप्टी कमिश्नर राजेश प्रसाद का बेटा है तब वह उसे प्यार से समझाते है की अगर हम तुमे अब पुलिस के हवाले करदे तो तुम्हारे पिताजी की इज्जत मिटटी में मिल जाएगी ! उनकी कितनी बदनामी होगी ! वह डर कर रोने लग जाता है की में आगे से कभी ऐसा कोई काम नहीं करूँगा ! में वायदा करता हूँ की कभी बिना टिकट लिए बस में सफ़र नहीं करूंगा ! उन अफसरों को अक्षित पर तरस आ जाता है वे कहते हैं की अगर तुम वायदा करते हो और तुमें अपने किये पर प्रायश्चित हें तो हमने तुमे माफ़ किया ! अत : हमें इस कहानी से यही शिक्षा मिलती है की कभी भी लालच में आकर ऐसा कोई काम नहीं करना चाहिए जिसके परिणाम नुकसानदायी हो !

Tuesday, March 9, 2010

गुलिस्तान हमारा

मजहब नहीं सिखाता आपस में वैर रखना , हिंदी हैं हम वतन है ये हिन्दुस्तान हमारा, अनायास ही शब्द मेरे मुख से निकले जब में माई नेम इस खान देख रही थी ! यह बात शायद बहुत पुरानी हो गयी है परन्तु देखने व लिखने का मौका अभी मिला ! मीडिया हमारे लोकतंत्र का चौथा स्तम्भ है यह हम सब भली- भांति जानते है ! मिटटी को सोना बना सकता है और आकाश के तारे को शायद एक आम इन्सान ! इस फिल्म के बारे में हर व्यक्ति की अपनी राय रही होगी लेकिन में यही कहना चाहूंगी की हमारी परवर्ती दुसरे को गलत सबित और गलतियाँ निकलने की बन चुकी है ! कभी हम राजनीती तो कभी पुरे सिस्टम को दोष देते हैं लेकिन यह भूल जाते हैं की ये लोग भी हमारे जैसे हैं ! क्यों न अब शुरुआत खुद से की जाये ! इस फिल्म को खासतौर से मीडिया से जुड़े लोगों को जरुर देखना चाहिए ! हम किसी भी गलत बात को बहुत जल्दी सीखते हैं! क्यों न इस बार प्रयास कुछ अच्छे से किया जाये ! लेखक ने सही कहा है की सिर्फ दो तरह के लोग हैं अच्छे और बुरे ! मजहब चाहे कोई भी हो सभी गुरुओं , पीर, पेंग्म्ब्रों ने सच्चाई व नेकी के राह पर चलने का सबक दिया है ! लेकिन आज धर्म के नाम पर इतने झगडे , दंगे -फसाद हो रहे है ! जिनका घर बर्बाद हो गया कोई उनसे पूछे , जिस घर का जवान लड़का कौमी लडाई में चला गया उस माँ के दिल का हाल बयाँ कोई नहीं कर सकता ! जब कुछ करने का जज्बा व् नीयत भली हो अगर लक्ष्य सिर्फ दूसरों की भलाई तो शायद कभी कोई यह न देखे की सामने वाला पीड़ित किस कौम का है ! हमारा देश तो एक फूलों का रंग- बिरंगा गुलदस्ता है , जंहा तरह- तरह के सुगन्धित फुल अपनी खुशबू , व सुन्दरता को बनाये हुए हैं ! जब भी देश पर विपति आई है पूरा भारत सर्वदा एक जुट हो सामने आया है लेकिन जब भाषा , धर्म और कभी मंदिर तो कभी मस्जिद के नाम पर खून - खराबा होता है तो मानवता भी शर्मसार हो जाती है ! मीडिया को भी चाहिए कभी टी. आर . पी. की दौड़ से बाहर आकर अपना फ़र्ज़ पहचाने ! जब दो भिन्न धर्मों के लोग एक साथ दिवाली मानते है वो कवर करना शायद मुश्किल हो लेकिन एक जलती बस का सीन सारा दिन टी. वी पर चलता है ! जिससे देश के बाकि हिस्सों में बैठे लोग कभी संपर्क ना हो पाने के कारण चिंता में जान दे देते है ! यह जानकारी के लिए है , सूचना के लिए है ताकि मीलों दूर बैठे होने पर भी हम इनसे जुड़े रहें ! वंही विपत्ति आने पर यही चैनल वाले सहायता भी करते हैं ! कई मुद्दे ऐसे हैं जो मीडिया के कारण प्रकाश में आये और उन्हें न्याय मिल सका ! में फिर वही बात दोहराना चाहूंगी अच्छाई और बुरे , हर स्थान , हर वस्तु में है परन्तु अति हर चीज की बुरी है ! अत : यही गुजारिश मीडिया से भी अपनी जिम्मेदारियों को और परिपक्वता , ईमानदारी से निभाए क्योंकि कमियां शायद कई अधिक होगी लेकिन आज हम कुछ शुरुआत अच्छाई से करेंगे ! जैसे जब एक सत्तर वर्षीय बुजुर्ग को पेड़ लगता देख उसका पोता पूछता है की दादाजी इसका क्या फायदा आप तो इसके फल नहीं खा पाएंगे ! उन्होंने हसकर कहा लेकिन तुम और आने वाली कई पीड़ियाँ तो खायेंगी व इसकी छाया में विश्राम करेंगी ! जैसे की हम अपने बुजुर्गों द्वारा लगाये गए वृक्षों का इस्तेमाल करते आये हैं ! वह बच्चा भी इससे सीख लेता है की हाँ में भी आगे चलकर यह नेक कार्य अवश्य करूँगा ! अत इंसान को उसकी मानवता से पहचे नाकि रंग , धर्म व जाति से !




Sunday, February 28, 2010

उम्र नहीं , सपने रहे जंवा



सेमीनार ख़त्म हो गया था ! सबका ध्यान अब कॉफ़ी- हाउस में हो रही चाय पार्टी की तरफ था ! इन में वो लड़का भी आये हुए कुछ मेहमानों के साथ उसी और बढ़ रहा था ! उसके चहेरे की बेशर्मी देख मुझे दुःख हो रहा था ! यह वही था जो शायद कुछ देर पहले किसी के सपनो का मजाक बनाकर आया था ! ऐसे शक्सियत का जिसने शायद इस सपने के लिए अपनी पूरी जिन्दगी लगा दी ! और खुद को मार कर भी इसे जिंदा रखा! अगर किसी नौजवान ने यह सब किया होता तो कोई बड़ी उपलब्धि नहीं थी! लेकिन एक अस्सी वर्षीय बुजुर्ग नौजवान को फुर्ती से कार्य करता देख कोई भी हैरान होगा ! में बात कर रही हूँ ''पी एन शाही '' जी की जिनकी पुस्तक '' युग वरतारा'' जो एक पंजाबी नाटक की किताब है उसकी ऑडियो सी' डी जो अब बन कर तैयार हुई है ! उसकी लौन्चिंग का ( माफ़ी चाहूंगी उचित शब्द खोज नहीं पाई )! मैंने यह नोवेल नहीं पड़ा लेकिन वंहा सभा में आये सभी महानुभव ने जो टिप्पणी की उसे से यही ज्ञात हुआ की यह आज की समस्याएँ , हमारे गिरते नैतिक मूल्य , विश्वास की कहानी है ! जिसमे कुल मिला कर छ पात्र है ! जिसमे एक दरवेश , खुसरा , एक चित्रगुप्त , राजनितिक , धर्मराज , व अब तक पीड़ा भोगती आ रही महिला को एक पवित्र रूह का किरदार दिया गया ! आज शाही जी का सम्मान बहुत ही मशहूर लेखिका दिलीप कौर टिवाणा जी ने किया ! में अब अपनी बात पर आना चाहूंगी सुबह जब हम क्लास लगा रहे थे तो सेमिनार हॉल को फूलों से सजाया जा रहा था ! एक इंसान बहुत ही तलीनता से इसमें जुड़ा था ! रूचि न होने के कारन एक झलक देख चले गए लेकिन हम हैरान थे जब देखा की उन्हें सम्मान दिया जा रहा है ! तभी एक आवाज आती है की अरे यह तो वही हैं जो सुबह खुद ओह गोड़ ही इस रियल स्टार ! किसी की आँखों से आंसू झर रहे थे कोई नमस्तक था ! तभी उनका परिचय दिया गया आजादी की जंग में सब खोया , दंगो में जवान बेटा , कैंसर के मरीज हुए ! उन्हें देखकर लगा की अगर सपनों को पूरा करने का हौसला है तो हर बाधा को हटाया जा सकता है ! हर बुद्धिजीवी चाहे गायक हो या लेखक हमेशा चाहेगा की मुझे प्रसिधी मिले लोग मेरे कार्य को जाने ! बात पैसे की नहीं मान -सम्मान की है ! कितने मजबूर होंगे जब उन्होंने खुद आकर कहा की मेरा किसी ने कभी सम्मान नहीं किया ! पर मुझे दिल से ख़ुशी है की डॉ हरजिंदर वालिया ने एक प्रयास किया ! उनके इस सपने को पूरा करने का इस सब में वो मेरे साथ बैठा लड़का उनके बारे में बहुत अपशब्द बोल गया ! जिसे सुनकर शायद बाकि बैठे लोगों को भी शर्म आई ! में सिर्फ उस एक लड़के की बात नहीं कर रही ऐसा बहुत बार होता है ! लेकिन हमेशा यह याद रखे की कमियां निकलना बहुत आसान है वंहा पहुंचना बहुत मुश्किल शायद वंहा अगर हमारे परिवार का कोई सदस्य होता तो हम पर क्या गुजरती ! किसी का दर्द ,लेकिन कंही बोरियत,कंही फुसफुसाहट तो कंही आंसू !किसी के अरमानो की डोली या जिन्दगी का पसीना लेकिन कंही एक हंसी ,या किसी के सपनों का मजाक़ ! लेकिन में कन्हुगी सीख यह है तू चलता जा मंजिल जरुर मिलेगी , न घबरा , डट कर सामना आने वाली मुश्किलों का चलता जा ...........बस

Saturday, February 27, 2010

छूटते जा रहे है होली के रंग


हमारे जीवन में रंगों का बहुत महत्व है ! हर रंग अपने आप में कुछ कहता है ! हर रंग से जिन्दगी का कोई न कोई पहलु जुड़ा है ! कोई शक्ति का प्रतीक है तो कोई शांति का ! इन रंगों से अलग- अलग कहानिया भी जुडी है ! कहा जाता है की सफ़ेद चाँद की चांदनी से चुराया है और गहरा काला रात के अँधेरे से , हरा लहलहाती हरियाली का प्रतीक है तो पीला सरसों व गेंदे के फूलों का वही गुलाबी को सुन्दरता का रंग माना गया है ! हमारे आस -पास कितने ही रंग बिखरे पड़े हैं ! इनका एहसास करने और यह कामना करने , की हमेशा ये सुंदर रंग जिन्दगी को इसी प्रकार खुशहाल बनाये यह होली का त्यौहार मनाया जाता है ! इसका इतिहास जितना पुराना है उतना ही शिक्षाप्रद है ! होली से पूर्व किया जाने वाला होलिका देहन बुराई पर अच्छाई की जीत का सन्देश देता है ! प्राचीन संस्कृत कवियों से लेकर आधुनिक कवियों ने होली का बहुत गुणगान किया है ! मथुरा , वृन्दावन ,व ब्रज की होली में आज भी कृष्ण भगवान की छवि को देखा जाता है ! कंही लट्ठ मार तो कंही फूलों की वर्षा की जाती है ! हमारी संस्कृति का प्रतीक है यह त्यौहार ! होली का त्यौहार साल में एक -बार आता है ! लेकिन आज इस उत्सव का अर्थ ही बदल गया है ! एक समय था जब सब गिले - शिकवे भुलाकर एक दुसरे के गले लग जाते थे ! दुश्मन भी दोस्ती का हाथ आगे कर पुराना वैर -विरोध छोड़ देते थे ! एक दुसरे पर रंग ढाल सब गुलाल के सप्त्रंगो में रंगीन हो जाते ! लेकिन आज इसी त्यौहार के नाम पर कीचड़ , कालिक मल इसे गन्दा किया जाता ! तेज आवाज में फूहड़ , द्विअर्थी गीत चला अश्लील हरकते की जाती है ! बुजुर्गों को जो परेशानी होती वह अलग स्त्रियाँ घर से बाहर नहीं निकल सकती ! नशे किये बिना यह पूर्ण नहीं होता व शराब , चरस इत्यादि पीकर लोग आपस में झगडे करते हैं व कईं बार कोई नव-विवाहित इस दिन बेरंग हो जाती है ! किसी माँ की गोद सुनी हो जाती है ! होली के रंग अगर सद्भावना, प्रेम उमंग के हो तो अच्छे लगते हैं लेकिन अगर साम्प्रदायिकता के हो तो कहर बरसा देते है ! आज जन्हा एक तरफ रोज बेगुनाह लोग मर रहे हैं कौन मनायेगा यह होली ! इसमें क्या दोष था उनका जो बम्ब विस्फोट में मारे गए या तालिबानियों के गुस्से का शिकार हुए या वे जो रोज गरीबी से पल- पल मर रहे हैं ! अंत में सबको होली की यही मुबारक बाद देना चाहूंगी की होली शालीनता के दायरे में मनाये जिसे किसी को परेशानी न हो ! क्योंकि कल को शायद आप भी उस मजबूर की जगह हो सकते हो ! पानी व्यर्थ न बहाएं व अपने टूटे हुए रिश्तों को जोड़ने का प्रयास करे ! हर परिवार को खुशियों की होली नसीब हो लाल रंग ख़ुशी का हो ! हम खून की नहीं गुलाल की होली खेले ! क्योंकि दूसरों की जिन्दगी उजड़ने वाले शायद रंगों को भूल गए हैं ! जब रंग उनसे रुठेंगे तो वे बदरंग हो जायेंगे ! अब वक़्त है जिन्दगी के रंगों को समझने व जानने का !