
Thursday, September 8, 2011
हम भी है तेरे साये में

Thursday, February 4, 2010
विरह की रात
बारिश भरी रात भी एक , कितना कुछ है कह देती ...
वह शांत सा मौसम , वो ठंडी -ठंडी हवा ..
जसी प्रियतम को मिलने चली हो प्रिया
बिजली का कड़कना , अँधेरे का बढ़ना ..
जैसे रही हो ढूंड , मिलन की जगह ,
कितने समय से वो रही थी तरस .
आज कहता है मन दिल खोल कर बरस,
प्यास दिल की कभी न बुझ पायेगी ,
इस प्यारी , सुंदर रात को जी लो ये फिर
ना वापिस आएगी , कभी ना वापिस आएगी !!
Monday, February 1, 2010
अनजाने रिश्ते
खचा-खच भरी हुई एक प्राइवेट बस में में अपने भाई के साथ बैठी हुई अपने गाँव से शहर जा रही थी ! पूरे रास्ते खिड़की से बाहर देखते हुए सिर्फ बड़े -बड़े धूल के गुबार नजर आ रहे थे और सड़क के नाम पर गड्ढे ! कभी अपने प्रदेश की तरक्की के बारे में सोचती की उसे नंबर एक का दर्जा क्यों दिया गया है और कभी भीड़ में खड़े लोगों के चेहरों को ! सब सोच ही रही थी की वो धीरे -धीरे चलती बस रुक गयी और एक करीबन सत्तर वर्षीय वृद्ध व उनके साथ दो महिलाएं बस में चढ़ गयी ! उन बाबा जी की तबियत बहुत खराब थी ! उसे देख मेरे साथ बैठा मेरा चौदह वर्षीय भाई खड़ा हो गया और वो मेरे साथ बैठ गए ! उनको पथरी का दर्द हो रहा था ! वह उनकी पीड़ा अवस्था असहनीय थी ! वे न बैठ पा रहे थे और न खड़े ! पूरे रास्ते मैंने अपनी बाजू से उनको पकडे रखा ! वे आँखें जेसे कुछ कह रही थी पर शायद जुबान साथ न दे रही हो ! एक अनजाना रिश्ता सा जुड़ गया था , शायद दर्द का रिश्ता ! मैंने उनके साथ आई महिला से पूछा की आप इन्हें कंहा लेकर जा रही है ! वे कहने लगी ये मेरे ससुर है इन्हें पथरी थी कुछ दवाइयां खायी तो ठीक हो गयी पर पानी भर गया ,सरकारी अस्पताल लेकर जाते हैं ! में सोचने लगी वाह से इंसान , शायद इस दर्द से बड़ा दर्द गरीबत का है ! मेरा भाई कहने लगा आप किसी बड़े अस्पताल ले जाईये लेकिन उनकी हालत सब कुछ बयाँ कर रही थी जो वो बच्चा नहीं समझ पाया ! सब तमाशबीन बने देख रहे थे और मुझे कुछ समझ नहीं आ रहा था ! गुस्सा आ रहा था की कितने लाचार हैं हम चाँद पर तो पहुँच गए पर एक बीमार को अस्पताल ले जाने तक की व्यवस्था न कर पाए ! उनका चेहरा देख मुझे बड़े - बड़े मंत्रियो की याद आ रहे थी और उनके झूठे वादों की जो इन्ही पांवो को छूकर जीतने के आशीर्वाद लेते हैं ! आज यही पैर चलने को भी मोहताज हो जाते हैं !आगे जाकर बस खराब हो गयी उनकी हालत बिगडती जा रही थी ! पहले ही बहुत देर हो चुकी थी ! मैंने कहा आप रिक्शा कर लीजिये वह अन्दर तक छोड़ देगा ! लेकिन उनकी बेबसी ने उन्हें मजबूर कर रखा था ! तभी एक व्यक्ति को मैंने कहा आप जाकर ले आइये ! कुछ देर बाद रिक्शा आया व हमने बहुत मुश्किल से उन्हें बिठा दिया ! उनका चेहरा बहुत कुछ कह रहा था ! हम आगे आये मैंने भैया से पैसे पूछे और उन्हें नमस्ते कर चली गयी ! उनकी आँखों ने बिना कहे कंही हज़ार शब्द कह दिए ! हमने ऑटो पकड़ा ! मेरा भाई पूछता रहा दीदी वो उन्हें कार में क्यों नहीं लाये ! अपने पैसे क्यों दिए ! पर मेरा दिल सिर्फ यही दुआ कर रहा था की आज कंही से कोई फ़रिश्ता आ जाये और उनका इलाज करदे !
Friday, January 29, 2010
दहेज़
माँ यह दहेज़ क्या होता है ? नेहा ने हैरानी से पूछा ! क्या हुआ बेटा आपने कहा सुन लिया सुनीता ने पूछा, नहीं माँ वो श्रेया कह रही थी, उसकी मम्मी तो अभी से घर की हर चीज उसके दहेज़ के लिए जोड़ रही हैं ! आप बताओ ना , ओह मेरी बिटिया की शादी में अभी बहुत समय है ! आपके पापा तो वैसे ही दहेज़ के सख्त खिलाफ है ! परन्तु माँ ये होता क्या है ! यह वो राक्षस है जो रोज ना जाने कितनी ही लड़कियों को निगल रहा है ! बिना किसी कसूर के ! शादी के समय दी जाने वाली वो प्यारी सौगात जो आज इस समाज के कारण लोगों की परतिष्ठा व दिखावे का प्रतीक बन गयी है ! जो यह दिखावा नहीं कर पाते उसकी सजा उन मासूमों को अपनी जान देकर ...............! क्या मम्मी कैसे बातें कर रहे हो ! बेटा शादी के समय घर का सामान फ्रिज, टी;वी , इत्यादि जो दिया जाता है उसे ही दहेज़ कहते हैं ! ओके माँ ! आप इस बात को छोडो और जाकर पढाई करो ! कुछ दिन बाद अरे मिसेज शर्मा हद हो गयी ! अपने ही पड़ोस में ऐसी घटना , शर्म क्यों नहीं आती लोगों को ऐसा करते ! वे क्यों भूल जाते हैं की अगर उनकी बेटी के साथ कोई ऐसा करे ! अरे नेहा बेटा आप आ गए , कैसा रहा स्कूल में आपका दिन ! माँ एक बात कहू आप मानोगे हाँ बेटा बोलो , प्लीज़ आप मुझे मेरी शादी में दहेज़ जरुर देना लेकिन क्या हुआ ? मुझे आरती आंटी की तरह जल कर नहीं मरना ! गली में सब कह रहे थे की देखो कैसे पापी है , दहेज़ के लिए बहु को जला दिया ! सुनीता बिना कुछ कहे खाना लेने चली गयी !
Monday, January 4, 2010
सरहदी रिश्तों का खून
उन्हें हमारे ख्याल आया ........हम तो उन्हें भुलाये बैठे थे,
अपनी यादों के...
झरोखों में .........
ना जाने कैसे आज सरहद पार,
उनका पैगाम आया ,
पैगाम उनका वही मजबूरियों की...
कहानी कह रहा था ....
कह रहा था की दिल तुम्हे बहुत याद करता है
तुम्हारी सलामती की हर दम दुआ करता है ..
चाहता है मिलना पर ..
दूरियां बहुत है ..या यूँ कहो
दुनिया ने बनाई मजबूरियां बहुत है .
यह एक सरहदी रेखा पार नहीं होती
अब तो दिल के दर्द में साथ देना आँखों ने भी
छोड़ दिया है ..
और हमेशा उसके पैगाम ने दिल मेरा तोड़ दिया है
काश में कोई परिंदा होती ..
तो उड़ कर उसके पास चली जाती ..या हवा
होती तो उसकी साँसों में घुल जाती..
पर में तो एक मजबूर इंसान हूँ , जो हालातों और सरहदों का
मोहताज है , जिसके लिए इंसानी रिश्तों से बढ़ कर
ये इमारतें , और जमीन जायदाद है .
खून के रिश्तों का ही खून करने पर
आमदा है ....
या खुदा क्यों?
कब इन्हें इस गलती का एहसास हो पायेगा
शायद तब तक बेगुनाहों के लहू से ये संसार
लाल हो जायेगा ! लाल हो जायेगा
Friday, January 1, 2010
नव वर्ष की बधाई
वृंदा गाँधी