Tuesday, June 8, 2010

कंहा लगाये गुहार


इस इन्साफ से तो , वह इंतज़ार अच्छा था ,
एक उम्मीद की ,  शमा तो जलती थी ! 
काश ! थोड़ी सी गैस और नसीब हो जाती तो न यह जीवन रहता न लाचारी ! यह कहना है उस महिला का जिसने पच्चीस वर्ष पहले अपनी आँखों की रौशनी को खोया था ! इस देश में इंसान की जान के अतिरिक्त हर चीज की कीमत है ! उन चंद मुआवजों के टुकड़ों से अगर  किसी की तीसरी पीडी भी अपंग होने से बचती या परिवारों के बुझे चिराग जल उठते , तो शायद उन बूढी आँखों में ख़ुशी की नमी होती ! कितनी ही जिंदगियां पल- भर में म्रत्यु के आगोश में चली गयी !हमारा प्रशासन आराम की चादर  ओड  सोता रहा ! बच्चों को कैंसर , विकलांगता विरासत में मिली , अगर नहीं मिला , तो वह था न्याय ! यह पहला  मानव नरसंहार नहीं था , कभी गोधरा कांड , तो ८४ के दंगे , बाबरी मस्जिद , या उड़ीसा का धर्म के नाम पर झगडा उनमें एक नाम भोपाल त्रासदी का भी जुड़ गया !  जो अब तक यह उम्मीद में जी रहा था की उसे न्याय मिलेगा ! अब इस पर भी कोई टेलीफिल्म , फिल्म  बनकर ऑस्कर के लिए जाएगी ! वंहा रह जाएगी तो बस आंहे , कब हमारा प्रशासन नींद से जागेगा ! कब रक्षक के नाम पर बैठे राजनितिक भक्षकों पर कोई शिकंजा कसेगा ! अब समय आ गया है की कानून आँखों पर बंधी इस पट्टी को उतार दे ! कब तक न्याय और कानून व्यवस्थता   का परिहास बनता रहेगा ! वक़्त आ गया है , बदलाव का नयी सोच का ! इन पंक्तियों के माध्यम से कुछ कहना चाहूंगी !
उन आंसुओं  को देख , मन सोचता है ,
आकर कोई अमन भरा संसार बसा दे ,
अगर असंभव सा लगता है यह कार्य ,
आकर गुनेह्गारों को सजा दिलवादे ,
कानून प्रणाली  ऐसी हो जाये , की फिर  कोई एडरसन   भारत में न आ पाए !

7 comments:

  1. andarsan ate rahenge jabtak ki bharat me un jaiso ko bachane vale log maujood hai...



    गाँधी जी का तीन बन्दर का सिद्धांत-एक नकारात्मक सिद्धांत http://bit.ly/b4zIa2

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  2. मौत के सब रूप हैं... कभी वो दंगों के रूप में आती है, तो कभी बड़े गैस लीकेज हादसे के रूप में तो कभी हवाई हादसे के रूप में। लेकिन अफसोस की बात है कि टेक्नोलॉजी के साथ साथ हम संजीदा नहीं हुए... जिसके कारण ऐसे हादसे होते हैं।

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  3. sahi kaha kulwant ji...maut to kisi bhi roop me aa sakti hai...par hame ye sunishchit karna hoga ki kahin ham to un mrityuon ka karan nahi ban rahe...badhiya aalekh

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  4. ऐसी व्‍यवस्‍था के बारे में क्‍या कहा जा सकता है .. भाग्‍य भरोसे जीने की लाचारी है !!

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