Thursday, June 27, 2013
चाँद और सपने
Thursday, September 20, 2012
आत्मशक्ति
Wednesday, May 16, 2012
आसमां का सफ़र
नन्ही सी जान थी , ये जहान मिला है मुझको गिरते उठते -क़दमों ने , संभलकर चलना सिखाया मुझको ...
खामोश लबों पर मुस्कराहट की पहचान मिली है मुझको ...
खूबसूरत सपनों का एक संसार मिला है मुझको ..
इस दुनिया में कुछ करना है . अपने नाम को सार्थक करना है ..कुछ ख्वाब सजाये थे ..
लेकिन गुज़रते वक़्त ने सपनों की तस्वीर बदलनी चाही ..
कैसे अपने सपनों को भूल चली थी मैं ..
अपनी ख्वाहिशों का गला घोट .. किस और चली थी मैं ..
आज इन एहसासों ने उम्मीद की किरण दिखाई है मुझे ..
अपने भरोसे आसमान का सफ़र मुझे तय करना है ..
जिंदगी में आगे बढ़ ..सपनों को साकार करना है ...
Sunday, June 26, 2011
Thursday, June 9, 2011
ਯਾਦਾਂ
ਜਿੰਦਗੀ ਤੋ ਦੂਰ ਵੀ , ਮੇਰੀ ਸਾਹਾ ਵਿਚ ਵਸੰਦਾ ਹੈ ,Wednesday, June 8, 2011
कितनी ज़रूरी है मुस्कुराहट
Tuesday, April 19, 2011
अनबोली आँखें
Tuesday, February 8, 2011
वैलेंटाइन डे
Saturday, June 26, 2010
माँ की लोरी (बिटिया के लिए)
जिस दिन से तू आई ,
अपनी माँ के जीवन में एक नया उजाला लायी ,
ना चाहता था कोई ,
की तू इस दुनिया में आये ,
लेकिन चाहती थी में ,
आ इस परिवार का वंश बढाये,
मेरे सारे सपनो को ,
साकार तुझे अब करना है ,
हिम्मत और शक्ति से , नित तुझे आगे बदना है
बेटी नहीं है बोझ , बदलेगी यह सोच ,
अब मुझको विश्वास है , नाम करे
परिवार का रोशन , यह एक माँ की आस है !!
Monday, June 21, 2010
सकरात्मक सोच
Friday, June 18, 2010
कंहा गयी वो मासूमियत
Friday, March 26, 2010
आशाओं के संग
जिन्दगी में कुछ हासिल करने, स्वप्न सलोनों को पूरा करने,
अपनी ही उमंगों में चलता, मुश्किलों को चुनौती समझ उनसे जूझता,
जैसे आगे बढ़ने की होड़ में नदियों या लहरों का टकराना, उनका छिन्न-भिन्न होना,
लेकिन फिर उसी उत्साह से आगे बढ़ना, पतझड़ में फूलों का एक-एक गिरता पत्ता,
लेकिन बसंत में खिलने वाली नई कोपलों की आस लिए,
यही जीवन के हैं रंग, आशा और निराशा संग -संग ,
अंत मुश्किलों का कर सामना, सपनों को न मरने दें,
भरता जा उनमें नित नए रंग, खुशियों व नई आशाओं के संग,
आशाओं के संग ...........
माँ
एक ' हस्ती ' थी जो हमारे रोने और टूटे - फूटे अल्फाजों को भी समझ जाया करती थी !
खाना बनाते वक़्त भी रस्सी हाथ में ले , झूला झुलाया करती थी,
हमारे साथ हर पल बड़ी हुई , हर मुश्किल में साथ खड़ी हुई
आज आसानी से कह देते हैं , आप नहीं समझेंगी , रहने दीजिये ,
आज भी जब नाम तेरी बेटी का छपता है , ऐह माँ मुझे असर तेरी दुआओं का लगता है ,
आज भी अचानक उठ जाती है सोते -सोते , जब कह दिया था माँ मुझे डर लगता है !!उस वात्सल्य मई को हमारा कोटि - कोटि अभिनन्दन ! आप सभी को माँ के लिए मनाये जाने वाले इस दिवस की की बहुत बहुत शुभ कामनाएं ! महंगे तोहफों के साथ साथ क्यों न आज एक प्रण लिया जाये की इस माँ का आदर कर उचित सम्मान करेंगे ! इस माँ को जीवन के किसी भी क्षण किसी का मोहताज नहीं करेंगे
Tuesday, March 9, 2010
गुलिस्तान हमारा
मजहब नहीं सिखाता आपस में वैर रखना , हिंदी हैं हम वतन है ये हिन्दुस्तान हमारा, अनायास ही शब्द मेरे मुख से निकले जब में माई नेम इस खान देख रही थी ! यह बात शायद बहुत पुरानी हो गयी है परन्तु देखने व लिखने का मौका अभी मिला ! मीडिया हमारे लोकतंत्र का चौथा स्तम्भ है यह हम सब भली- भांति जानते है ! मिटटी को सोना बना सकता है और आकाश के तारे को शायद एक आम इन्सान ! इस फिल्म के बारे में हर व्यक्ति की अपनी राय रही होगी लेकिन में यही कहना चाहूंगी की हमारी परवर्ती दुसरे को गलत सबित और गलतियाँ निकलने की बन चुकी है ! कभी हम राजनीती तो कभी पुरे सिस्टम को दोष देते हैं लेकिन यह भूल जाते हैं की ये लोग भी हमारे जैसे हैं ! क्यों न अब शुरुआत खुद से की जाये ! इस फिल्म को खासतौर से मीडिया से जुड़े लोगों को जरुर देखना चाहिए ! हम किसी भी गलत बात को बहुत जल्दी सीखते हैं! क्यों न इस बार प्रयास कुछ अच्छे से किया जाये ! लेखक ने सही कहा है की सिर्फ दो तरह के लोग हैं अच्छे और बुरे ! मजहब चाहे कोई भी हो सभी गुरुओं , पीर, पेंग्म्ब्रों ने सच्चाई व नेकी के राह पर चलने का सबक दिया है ! लेकिन आज धर्म के नाम पर इतने झगडे , दंगे -फसाद हो रहे है ! जिनका घर बर्बाद हो गया कोई उनसे पूछे , जिस घर का जवान लड़का कौमी लडाई में चला गया उस माँ के दिल का हाल बयाँ कोई नहीं कर सकता ! जब कुछ करने का जज्बा व् नीयत भली हो अगर लक्ष्य सिर्फ दूसरों की भलाई तो शायद कभी कोई यह न देखे की सामने वाला पीड़ित किस कौम का है ! हमारा देश तो एक फूलों का रंग- बिरंगा गुलदस्ता है , जंहा तरह- तरह के सुगन्धित फुल अपनी खुशबू , व सुन्दरता को बनाये हुए हैं ! जब भी देश पर विपति आई है पूरा भारत सर्वदा एक जुट हो सामने आया है लेकिन जब भाषा , धर्म और कभी मंदिर तो कभी मस्जिद के नाम पर खून - खराबा होता है तो मानवता भी शर्मसार हो जाती है ! मीडिया को भी चाहिए कभी टी. आर . पी. की दौड़ से बाहर आकर अपना फ़र्ज़ पहचाने ! जब दो भिन्न धर्मों के लोग एक साथ दिवाली मानते है वो कवर करना शायद मुश्किल हो लेकिन एक जलती बस का सीन सारा दिन टी. वी पर चलता है ! जिससे देश के बाकि हिस्सों में बैठे लोग कभी संपर्क ना हो पाने के कारण चिंता में जान दे देते है ! यह जानकारी के लिए है , सूचना के लिए है ताकि मीलों दूर बैठे होने पर भी हम इनसे जुड़े रहें ! वंही विपत्ति आने पर यही चैनल वाले सहायता भी करते हैं ! कई मुद्दे ऐसे हैं जो मीडिया के कारण प्रकाश में आये और उन्हें न्याय मिल सका ! में फिर वही बात दोहराना चाहूंगी अच्छाई और बुरे , हर स्थान , हर वस्तु में है परन्तु अति हर चीज की बुरी है ! अत : यही गुजारिश मीडिया से भी अपनी जिम्मेदारियों को और परिपक्वता , ईमानदारी से निभाए क्योंकि कमियां शायद कई अधिक होगी लेकिन आज हम कुछ शुरुआत अच्छाई से करेंगे ! जैसे जब एक सत्तर वर्षीय बुजुर्ग को पेड़ लगता देख उसका पोता पूछता है की दादाजी इसका क्या फायदा आप तो इसके फल नहीं खा पाएंगे ! उन्होंने हसकर कहा लेकिन तुम और आने वाली कई पीड़ियाँ तो खायेंगी व इसकी छाया में विश्राम करेंगी ! जैसे की हम अपने बुजुर्गों द्वारा लगाये गए वृक्षों का इस्तेमाल करते आये हैं ! वह बच्चा भी इससे सीख लेता है की हाँ में भी आगे चलकर यह नेक कार्य अवश्य करूँगा ! अत इंसान को उसकी मानवता से पहचे नाकि रंग , धर्म व जाति से !Sunday, February 28, 2010
उम्र नहीं , सपने रहे जंवा

सेमीनार ख़त्म हो गया था ! सबका ध्यान अब कॉफ़ी- हाउस में हो रही चाय पार्टी की तरफ था ! इन में वो लड़का भी आये हुए कुछ मेहमानों के साथ उसी और बढ़ रहा था ! उसके चहेरे की बेशर्मी देख मुझे दुःख हो रहा था ! यह वही था जो शायद कुछ देर पहले किसी के सपनो का मजाक बनाकर आया था ! ऐसे शक्सियत का जिसने शायद इस सपने के लिए अपनी पूरी जिन्दगी लगा दी ! और खुद को मार कर भी इसे जिंदा रखा! अगर किसी नौजवान ने यह सब किया होता तो कोई बड़ी उपलब्धि नहीं थी! लेकिन एक अस्सी वर्षीय बुजुर्ग नौजवान को फुर्ती से कार्य करता देख कोई भी हैरान होगा ! में बात कर रही हूँ ''पी एन शाही '' जी की जिनकी पुस्तक '' युग वरतारा'' जो एक पंजाबी नाटक की किताब है उसकी ऑडियो सी' डी जो अब बन कर तैयार हुई है ! उसकी लौन्चिंग का ( माफ़ी चाहूंगी उचित शब्द खोज नहीं पाई )! मैंने यह नोवेल नहीं पड़ा लेकिन वंहा सभा में आये सभी महानुभव ने जो टिप्पणी की उसे से यही ज्ञात हुआ की यह आज की समस्याएँ , हमारे गिरते नैतिक मूल्य , विश्वास की कहानी है ! जिसमे कुल मिला कर छ पात्र है ! जिसमे एक दरवेश , खुसरा , एक चित्रगुप्त , राजनितिक , धर्मराज , व अब तक पीड़ा भोगती आ रही महिला को एक पवित्र रूह का किरदार दिया गया ! आज शाही जी का सम्मान बहुत ही मशहूर लेखिका दिलीप कौर टिवाणा जी ने किया ! में अब अपनी बात पर आना चाहूंगी सुबह जब हम क्लास लगा रहे थे तो सेमिनार हॉल को फूलों से सजाया जा रहा था ! एक इंसान बहुत ही तलीनता से इसमें जुड़ा था ! रूचि न होने के कारन एक झलक देख चले गए लेकिन हम हैरान थे जब देखा की उन्हें सम्मान दिया जा रहा है ! तभी एक आवाज आती है की अरे यह तो वही हैं जो सुबह खुद ओह गोड़ ही इस रियल स्टार ! किसी की आँखों से आंसू झर रहे थे कोई नमस्तक था ! तभी उनका परिचय दिया गया आजादी की जंग में सब खोया , दंगो में जवान बेटा , कैंसर के मरीज हुए ! उन्हें देखकर लगा की अगर सपनों को पूरा करने का हौसला है तो हर बाधा को हटाया जा सकता है ! हर बुद्धिजीवी चाहे गायक हो या लेखक हमेशा चाहेगा की मुझे प्रसिधी मिले लोग मेरे कार्य को जाने ! बात पैसे की नहीं मान -सम्मान की है ! कितने मजबूर होंगे जब उन्होंने खुद आकर कहा की मेरा किसी ने कभी सम्मान नहीं किया ! पर मुझे दिल से ख़ुशी है की डॉ हरजिंदर वालिया ने एक प्रयास किया ! उनके इस सपने को पूरा करने का इस सब में वो मेरे साथ बैठा लड़का उनके बारे में बहुत अपशब्द बोल गया ! जिसे सुनकर शायद बाकि बैठे लोगों को भी शर्म आई ! में सिर्फ उस एक लड़के की बात नहीं कर रही ऐसा बहुत बार होता है ! लेकिन हमेशा यह याद रखे की कमियां निकलना बहुत आसान है वंहा पहुंचना बहुत मुश्किल शायद वंहा अगर हमारे परिवार का कोई सदस्य होता तो हम पर क्या गुजरती ! किसी का दर्द ,लेकिन कंही बोरियत,कंही फुसफुसाहट तो कंही आंसू !किसी के अरमानो की डोली या जिन्दगी का पसीना लेकिन कंही एक हंसी ,या किसी के सपनों का मजाक़ ! लेकिन में कन्हुगी सीख यह है तू चलता जा मंजिल जरुर मिलेगी , न घबरा , डट कर सामना आने वाली मुश्किलों का चलता जा ...........बस
Saturday, February 27, 2010
छूटते जा रहे है होली के रंग







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