Showing posts with label दिल की आवाज से. Show all posts
Showing posts with label दिल की आवाज से. Show all posts

Thursday, June 27, 2013

चाँद और सपने

सपनों  की नगरी से आया हूँ 
तुम भी एक सपना ले लो 
पैसा चाहो , गाडी चाहो या चाहो ऐशो आराम 
कोई  बनेगा बड़ा अफसर ऊँचा करेगा देश का नाम 
मैं सपनों का सौदागर तुम भी एक सपना ले लो 
कोई चाहे सेहत खजाना , कोई चाहे रंग-रूप ,
सोना  , चाँदी , हीरा मांगें जैसे तन पर धुप 
कोई मांगता खाना और कपडा , लेकर आँख में आंसू 
ना देखा कैसा होता है ,चाँद का चांदनी  जादू 
तुम हो सपनों के सौदागर ,तो सपना सच कर जाओ 
कोई न सोये  भूखे  पेट ये चमत्कार दिखलाओ 
सबके  सर पर छत हो रहे न झोली खाली 
कर दो सब सपनों को सच  , रात छट  जाए काली 
मांग - मांग तो बढती जाए कैसे करून मैं पूरा 
रोज़ दिखता हूँ मैं सपने , खुद जो ठहरा अधूरा 


Thursday, September 20, 2012

आत्मशक्ति

कभी लगता है , टूट के बिखर जाऊंगी 
माला के मनको की तरह , जो गले का हार नहीं बन पाते 
उन पत्तों की तरह जो तेज़ हवा के झोकों से ..
टूट कर हैं गिर जाते ..
बारिश की नन्ही बूंदों की तरह ..
जो फुहार बन हैं रह जाती ..
नदी की छोटी.... धारा की तरह ...
जो सागर से हैं मिलना चाहती ...
लेकिन तभी मन के एक कोमल हिस्से से ..एक मज़बूत आवाज़ है आती..
कभी धीमे तो कभी होकर तेज़ ..फिज़ाओं में है खो जाती 
वो आवाज़ प्रतीक है ..उन इच्छाओं का ..........
जो पूरी न होने के डर से हो गयी है शांत ..
वो आवाज़ देती है हिम्मत ..गिर कर उठ जाने का ...
और कहती है तुझे करना है सपनों को साकार ....
उस आवाज़ की बात मानने को जी चाहता है ..
अपने अस्तित्व की लडाई लड़ने को जी चाहता है 
आँखों में सजाएं उन सपनों के पीछे भागने को जी चाहता है ...
क्योंकि ये आवाज़ कहती है ..की खुली आँखों से देखे सपने ..
अक्सर सच हो जाते हैं ..
क्योंकि उन सपनों को हकीकत बनाने ..हम हर गम भूल जुट जाते हैं ...



Wednesday, May 16, 2012

आसमां का सफ़र

नन्ही सी जान थी , ये जहान मिला है मुझको
गिरते उठते -क़दमों ने , संभलकर चलना सिखाया मुझको ...
खामोश लबों  पर मुस्कराहट की पहचान मिली है मुझको ...
खूबसूरत सपनों का एक संसार मिला है मुझको ..
इस दुनिया में कुछ करना है . अपने नाम को सार्थक करना है ..कुछ ख्वाब सजाये थे ..
लेकिन गुज़रते वक़्त ने सपनों की तस्वीर बदलनी चाही ..
कैसे अपने सपनों को भूल चली थी मैं ..
अपनी ख्वाहिशों का गला घोट .. किस और चली थी मैं ..
आज इन एहसासों ने उम्मीद की किरण दिखाई है मुझे ..
अपने भरोसे आसमान का सफ़र मुझे तय करना है ..
जिंदगी  में आगे बढ़ ..सपनों को साकार करना है ...


Sunday, June 26, 2011

याद


आज भी सोचते हैं , तेरी बेरुखी की वजह 
दोष मुकद्दर  को दें .या तेरे प्यार के काबिल नहीं थे ! 

Thursday, June 9, 2011

ਯਾਦਾਂ

ਜਿੰਦਗੀ ਤੋ ਦੂਰ ਵੀ , ਮੇਰੀ ਸਾਹਾ ਵਿਚ ਵਸੰਦਾ ਹੈ ,
ਅਖਿਯਾਂ ਚੋ  ਦੂਰ ਪਰ ਆਖਾਂ  ਦਾ ਕਜ੍ਲ ਬਣਕੇ ਵਸਦਾ ਹੈਂ ..
ਅਵਾਜ ਸੁਣਨ ਨੂੰ ... ਤਰਸ ਗਏ , ਪਰ ਹੋਟਾਂ ਦੀ ਲਾਲੀ ਬਣਕੇ ਵਸਦਾ ਹੈਂ 
ਕਿਨੂੰ ਦ੍ਖਾਂਵਾ ਇਹ  ਸਾਜ-ਸੰਗਾਰ , ਕਿਦੇ ਲਈ ਹੂਣ ਸਜ੍ਦੀ ਹਾਂ 
ਯਾਦਾਂ ਤੇਰਿਯਾਂ  ਹਿਕ ਨਾਲ ਲਾਕੇ , ਰਾਹਾਂ ਤੇਰਿਯਾਂ ਤਕਦੀ ਆਂ ,
ਅਜ ਓਹੀ ਸ਼ੀਸ਼ਾ , ਚੰਗਾ ਨਹੀਂ ਲਗਦਾ , ਜਿਨੂ ਦੇਖ ਕੇ ਅਸ਼- ਅਸ਼ ਕਰਦੀ ਸੀ 
ਉਨ੍ਹਾਂ ਥਾਂਵਾ ਤੋਂ ਅਜ ਡਰਦੀ  ਹਾਂ , ਜਿਥੇ ਬਾਂਹ ਫੜ ਕੇ ਤੇਰੀ ਤੁਰਦੀ ਸੀ 
ਅਜ ਗੱਲਾਂ ਤੇਰਿਯਾਂ ਚੇਤੇ ਕਰਕੇ ਕੱਲੇ ਹੋਕੇ ਭਰਦੀ ਹਾਂ...
ਲੋਕੀ ਕਹੰਦੇ ਤੂ ਹੰਸਦੀ ਬੜਾ ਹੈ ...ਤੇਰੇ ਹਾਸੇਯਾਂ ਦੀ ਗਲ ਵਖਰੀ ਹੈ 
ਪਰ ਓਹ ਕੀ ਜਾਨਣ ਗਲ ਅਸਲੀ ਕੀ ਮੇਰੇ ਹਾਸਿਆਂ ... ਚ ਓਹਦੀ ਰੂਹ ਵਸਦੀ ਹੈ !




Wednesday, June 8, 2011

कितनी ज़रूरी है मुस्कुराहट


क्या आप कम हँसते हैं लेकिन आप क्यों कम हँसते हैं  ?
जिस तरह सिगरेट पीना , हमारी सेहत के लिए हानिकारक  है , उसी तरह कम हँसना भी हमारे लिए खतरनाक साबित हो सकता है ! हँसता - मुस्कुराता चेहरा हर किसी को अच्छा लगता है !

और हंसने से हमारे शरीर  में हेप्पीनेस  हार्मोन का  बनना बढ़ जाता है ! ये तो सभी जानते हैं कि जिंदगी में उतार - चढाव तो आते ही रहते हैं , इसे कहा जाता है ' पार्ट ऑफ़ लिविंग " , और उसी तरह कैसी भी परिस्थितियाँ आये , उनमें मुस्कुराते रहने को कहा जाता है ' आर्ट ऑफ़ लिविंग' , और  इसी आर्ट को हमें ज़िंदगी  में अपनाना चाहिए , एक प्यारी सी मुस्कुराहट हर चेहरे को खूबसरत बना देती है ! हमेशा ये ख़ूबसूरती बरकरार रहे इसके कुछ आसान टिप्स हैं ,
अपने दिन की शुरुआत मुस्कुरा कर करें , आज कल हम अलार्म लगा कर उठते हैं , जब सुबह आपका अलार्म बज रहा हो , तो उसे बंद कर दो मिनट खुद से बात कीजिये और एक गहरी सांस लें , और मुस्कुरा कर खुद से कहें,  ये पल अनमोल है , इस अदभुत पल को मुझे खुल कर जीना है ! इस क्रिया को दस - से बारह बार दोहराएं , दिन की शुरुआत अगर मुस्कुराते हुए होगी तो आपका  पूरा दिन अच्छा होगा ! 
आज जगह - जगह laughter क्लब बने हुए हैं , हंसने के लिए कई तरह की थेरपी भी चलन में हैं , जिंदगी में कितना भी तनाव हो मुस्कुराना चाहिए , कहते हैं मुश्किलें कितनी भी आयें , उनका सामना डट कर करें और हंस कर करें , धीरे - धीरे ये आपकी आदत में शुमार हो जायेगा ! 
अब हम बात करते हैं , स्माइल meditation की , अगर आप खुश नहीं भी हैं , तब भी आप मुस्कुराइए , इससे आपके दिमाग को लगेगा की आप बहुत खुश हैं , और इसके लिए सबसे अच्छा उपाय है , अपनी पुरानी  तस्वीरे देखिये , अपने उन पलों को याद कीजिये जब आप सबसे ज्यादा मुस्कुराई थी , उन तस्वीरों को अपने आस- पास , या किसी अलमारी या दीवार पर लगा  दें और जब भी उन्हें देखें , तो कुछ देर उन पलों को याद करें , आपको हंसी आ जाएगी ! बहाने खुद तलाशने पड़ते हैं , क्योंकि हँसना हमारे लिए हर तरह से फायदेमंद हैं ! 
जब हम हँसते हैं , तो  भगवान सारे ब्रह्मांड से कहता है , की ये इंसान हमेशा हँसता है , कितनी भी मुश्किल आये ये खुश है , और आप जानकर हैरान होंगे की हंसी हमें कई बिमारियों से भी बचाती है ! 
अपनी जिंदगी में भी आपने गौर फ़रमाया होगा , की जब हम कंही खरीदारी करने जाते है , तो जो दुकानदार प्यार से बात करता है और हंस कर बात करता है , हम उन्ही के पास जाना पसंद करते हैं ! अगर मेल या मेसेज में भी हम एक छोटी सी स्माइल बनाकर भेजते हैं , तो उसे देख कर भी हम मुस्कुरा देते हैं , और हर दम हँसते रहने  का सबसे आसान रास्ता है , अपने हाथ पर एक स्माइली बना लें , जब भी कोई काम करेंगे , या तनाव में होंगे उस smiley को देख कर आपके चेहरे पर  खुद- ब- खुद मुस्कराहट आ जाएगी , यही हर दम हंसने और खुश रहने का मन्त्र हैं !





Tuesday, April 19, 2011

अनबोली आँखें


 
जिन आँखों से प्यार है , जिन्हें देखने को तरसता हूँ ,
आज इन्हीं आँखों में आसूओं कि वजह बन गया हूँ ,
चाहता हूँ , वही कशिश इन निगाहों में ...
लेकिन क्यों अब ये तेरी आँखें चुप है ..
आज तेरी चहकती  आँखों कि चुपी बन गया हूँ 
कभी ख़ुशी से झूम जाती थी ये आँखें मेरा नाम सुनकर 
आज मेरे अक्स से काँप जाती हैं 
अक्सर ढूंढा करता था ,  उन सवालों का जवाब जो तेरी आँखें अक्सर किया करती थी ..
पर आज उन सवालों के जवाब देना चाहता हूँ ..
लेकिन अब वो आँखें मेरे साथ नहीं है , पर फिर भी कंही  मेरे आस-पास है ...
कंहा ये नहीं जानता लेकिन तलाश जारी है ! 


Tuesday, February 8, 2011

वैलेंटाइन डे

आज सुबह ही मेरे घर एक छोटा सा बच्चा आया की मुझे एक गुलाब का फूल दे दो  ! मुझे लगा की उसकी माँ ने लाने को कहा होगा पर मुझे हैरान होते देर न लगी जब उसने बताया की वो उसे अपनी गर्ल फ्रेंड को देना हे क्योंकि कल की छुट्टी है वाह  रे पश्चिमी सभ्यता आज सात साल का बच्चा भी वैलेंटाइन मना रहा है क्या प्यार के लिए भी हम किसी दिन के मोहताज है बाजारों की रोनक देखकर लग रहा हे की जेसे कोई बहुत बडा त्यौहार आने वाला हे काश इतना पैसा जो वैलेंटाइन डे पर खर्चा किया जाता हे उसका आधा भी किसी गरीब को दिया होता तो वो शायद पेटभर कर सो जाता पर  प्यार की अंधी दोड़ के आगे किसका बस चला है ! चलो प्यार करने वाले इसे मनाये पर अपनी सभ्यता को भी याद रखे नही तो शिव सेना वाले भी स्वागत को तैयार है पर अगर इसी  तरह हमने अपने राष्ट्रीय पर्वो को सिर्फ़ छुटी का दिन ना समझकर मनाया होता तो आज इतना दुःख ना होता.! 

Saturday, June 26, 2010

माँ की लोरी (बिटिया के लिए)

प्यारी बिटिया रानी ,

जिस दिन से तू आई ,

अपनी माँ के जीवन में एक नया उजाला लायी ,

ना चाहता था कोई ,

की तू इस दुनिया में आये ,

लेकिन चाहती थी में ,

आ इस परिवार का वंश बढाये,

मेरे सारे सपनो को ,

साकार तुझे अब करना है ,

हिम्मत और शक्ति से , नित तुझे आगे बदना है

बेटी नहीं है बोझ , बदलेगी यह सोच ,

अब मुझको विश्वास है , नाम करे

परिवार का रोशन , यह एक माँ की आस है !!

Monday, June 21, 2010

सकरात्मक सोच

एक अस्पताल में बड़ा सा वार्ड था ! जंहा कई मरीज दाखिल थे ! उनमें एक मरीज का स्थान खिड़की के पास था ! हर रोज कई बार डॉक्टर व नर्से मरीजों की परिचर्या करते ! उनमें एक मरीज हर वक़्त उदास रहता ! वह जिन्दगी से लगभग हार मान चूका था ! वह सदा डॉक्टर से मायूसी भरी बातें करता ! खिड़की के पास बैठा मरीज भी उसकी बातें सुनता व समझाने का भरसक प्रयत्न करता ! डॉक्टर जब भी उसे देखने आते उसे समझाते की तुम्हारा रोग इतना गंभीर नहीं है ! हिम्मत से काम लो अगर तुम ही जीने की आशा छोड़ दोगे तो दवाइयां क्या कर लेंगी ! लेकिन उसकी समझ में कुछ न आता ! खिड़की वाला मरीज भी उससे बातें करता ! उनके बेड़ एक -दुसरे से बहुत दूर थे ! दूसरा मरीज अक्सर खिड़की वाले मरीज को पूछता की दूसरी और क्या है ! वह मरीज कहता यंहा से प्रक्रति की मनमोहक छटा दिखती है ! बाहर एक बहुत बड़ा पार्क है जंहा बच्चे खेल रहे हैं ! दूसरा मरीज भी यह सब बातें सुन ईर्ष्या महसूस करता की काश में यह सब देख पता ! दूसरा मरीज अक्सर कोई न कोई रोना रोता रहता की की परिवार वाले ज्यादा सम्मान नहीं देते ! पैसे की कमी है ! वंही दूसरी और खिड़की वाला मरीज कहता की पास ही बहती एक नदी में बतखे तैर रही हैं ! गुब्बारे वाले रंग- बिरंगे गुब्बारे बेच रहे हैं ! बच्चे झूले- झूल रहे हैं ! अब धीरे- धीरे दूसरा मरीज भी सकरात्मक सोचने लगा ! खिड़की वाला मरीज उसे समझाता जिन्दगी बहुत खुबसूरत है बस हम ही उसके रंग तलाश नहीं पते ! उत्तार -चदाव तो जीवन में आते ही रहते है ! इसका मतलब यह नहीं की हम जीवन से हार जाये ! अब यह बातें उस पर असर करती थी ! वह भी एक खुशहाल जिन्दगी व परिवार जोड़ने का सवप्न सजाने लगा ! एक दिन जब वह सुबह उठा तो देखा वह बिस्तर खाली था ! वार्ड बाय ने आकर उसे खिड़की वाली सीट पर जाने को कहा ! वह अंतर्मन बहुत प्रसन्न हुआ की वह दुनिया के रंगों को देखेगा ! उसके सवप्न चूर हो गए जब उसने देखा वंहा खिड़की के साथ एक दिवार थी ! जब डॉक्टर आये और उसे कहा की अब उसकी सेहत पहले से बहुत बेहतर है ! उसने अपने मित्र और खिड़की के पुराने मरीज के बारे में पूछा डॉक्टर ने बताना शुरू किया तो उसके होश उड़ गए ! वह कैंसर का मरीज था ! उसका दुनिया में कोई नहीं था और न आज तक कोई उसे देखने आया ! लेकिन वह एक जिंदादिल इंसान था ! रात को हार्ट अटेक के कारण उसकी म्रत्यु हो गयी ! वह बहुत उदास हुआ और बताने लगा की वह तो खिड़की से मुझे सारी दुनिया का हाल सुनाता था ! डॉक्टर ने कहा यह कैसे हो सकता है वह तो अँधा था ! उस पर तो जैसे वज्रपात हुआ था , डॉक्टर कहने लगा यह सब उन्होंने आपको जिन्दगी से जोड़ने व हिम्मत से आगे बदने के लिए कहा होगा ! अत कभी हम सफलता न मिलने के , कारण भी नहीं तलाशते और किस्मत , भाग्य को कोसने लगते हैं ! सदा सकरात्मक नजरिया रखे जिससे आप संव्य तो प्रसन्न रहेंगे ही दूसरों को भी नयी राह दिखा सकेंगे

Friday, June 18, 2010

कंहा गयी वो मासूमियत

आज एक बच्ची को टेडी बिअर की जिद करता देख मुझे अपना बचपन याद आने लगा ! वह वैसे ही जिद कर रही थी जैसे की कभी मैने मुनिया की शादी के बाद उसके दुल्हे को देख कर की थी ! माँ मुझे भी चाहिए ऐसा दूल्हा जैसा मुनिया को मिला है जो हर दम उसके साथ रहेगा ! मुनिया गयी अब मेरे साथ कौन खेलेगा ! माँ हँसती हुई चली गयी लेकिन मेरे लिए ये गहन चिंता का विषय था ! जब मैंने माँ का पल्लू नहीं छोड़ा तब न जाने कंहा से एक नील से लथपथ टूटा -फूटा एक गुड्डा ले आई की ये रहा तेरा साथी कहकर चली गयी ! लेकिन मुझे तो मानो दुनिया मिल गयी थी! माँ मुझे घर भी नहीं छोडना पड़ेगा वाह.. वाह मजा आ गया ! लेकिन माँ के पास कंहा समय था यह सब देखने का उन्हें ईटों के भट्टे पर जाने के लिए देर जो हो रही थी ! इतने भाई -बहनों में कंहा याद रहता की किस बच्चे ने क्या कहा पर में तो लाडली थी न सबकी दुलारी छुटकी! आज के बच्चे तो हसेंगे ये नाम सुनकर सो ( बेक्वोर्ड )!लेकिन हम तो अपनी ही मस्ती में गुम थे ! बहुत खुश की दुनिया हमारे क़दमों में जैसे, सच्ची दोस्ती प्यार ,लड़ना , मरना ! उपहार के रूप में अगर किसी साथी ने कोई टॉफी , या चाकलेट दे दिया तब हम खुद को किसी शेहनशाह से कम ना समझते ! एक छोटे से कमरे में माँ को चिपकने के लिए सभी भाई- बहनों में एक होड़ सी लगी रहती थी ! मुझे अलग कमरा चाहिए मम्मी में शेरिंग नहीं कर सकती ! ऐसे जुमले आम सुनने को मिलते हैं ! समय का आभाव तो उस वक़्त भी था और आज भी है लेकिन कंही ना कंही रिश्तों की गर्माहट में कमी आ गयी है ! माँ की ममता में कभी कमी ना आ सकती लेकिन आज वे उसे अपने बच्चों पर निछावर नहीं कर पति ! उनकी जीवन -शेल्ली व दैनिक समय सारणी का पालन करते -करते उनकी सूचि के अंत में बच्चों का नाम आता है ! एक दिन घर पर अकेली थी इसलिए सोचा की पार्क में जाकर थोड़ी सैर कर लू ! वही बच्ची पार्क में मिली ! खुद को रोक नहीं पायी और उसके पास चली गयी ! उसको खेलता देख , आँखें उसे अपलक निहारती रही ! आपका नाम क्या है बेटा! वह कुछ पल ठहरकर सोचती हुई बोली ;;आ आंटी स्नेहा ! जितना सुंदर नाम उतनी ही सुंदर स्नेहा गोल- मटोल प्यारी सी गुडिया ! कुछ देर बाद बातें करते -करते मुझे स्नेहा का वो टेडी याद आया और में पूछ बैठी की आपके उस टेडी का क्या हुआ! उसने बहुत हैरानी से मेरी और देखा , और कहा कौन सा टेडी आंटी? मैंने कहा वही जिसको लेने की आप बहुत जिद्द कर रहे थे ! उसने कहा वो तो फेंक दिया गन्दा हो गया था ! में हैरानी से उसे देखती रही उसके चेहरे के शुन्य भाव देखकर मन फिर भूतकाल में चला गया ! मेरा नीला गुडा तो सारा दिन मेरे साथ रहता! मेरे साथ स्कूल जाता , खेलता , खाना खाता! मेरा पक्का दोस्त जिससे में हर बात करती ! आप भी हसेंगे की एक गुड्डा लेकिन मेरा साथी ! एक बार रेखा से लडाई होने पर उसने मेरे नीले गुड्डे को छुपा दिया कितना रोई थी में खाना भी नहीं खाया था ! अंत में माँ ने रेखा को बहुत मारा और मुझे मेरा गुड्डा दिलाया ! कितना अनमोल था न वो मेरे लिए ! गल्ली में लुकन- मिच्ची , भागम -भाग ! आज की तरह न मंहगे खिलोने न विडियो - गेम , न कम्प्यूटर . ना इन्टरनेट ! कितना निश्चल प्रेम , एक दुसरे की मदद करना ! आज बच्चों के साथ माँ - बाप भी आगे बदने की रेस में लगे है ! असली प्रत्तिभा को कोई पहचान नहीं ! रोज न जाने कितनी आत्म -हत्याएं , कितनी मौतें सिर्फ अपने लक्ष्य तक न पहुँचने के कारण हो जाती हैं ! अगर शर्मा जी के बच्चे ने प्रथम स्थान प्राप्त किया है तो हमारा चिंटू क्यों पीछे रह गया ! वे यह शायद भूल जाते हैं की हर इंसान भिन्न है शायद शर्मा जी का बेटा उतनी अच्छी चित्रकारी नहीं कर सकता जितनी चिंटू करता है ! पर यह बात पुराने ख्यालों की है ! इसे कोई नहीं समझना चाहता ! छोटे - छोटे बच्चे जिनके हाथ में कलम होनी चाहिए बन्दूक आ जाती है ! सरे आम विद्या घर में गोलियां चलती है ! कहते है बच्चों में भगवान् रहते हैं , क्यों लुप्त होती जा रही है वह मासूमियत ! इसके जिम्मेदार जाने -अनजाने हम खुद हैं ! कंही तन -उघाडू कपड़ों में वे अश्लील नाच तो कंही कॉमेडी करते नजर आते हैं ! वे न तो उन द्विर्थी गीतों का मतलब जानते हैं ! वे छोटे बच्चे उस प्रतिस्पर्धा में आगे बाद रहे हैं ! कभी न्यायाधीशों की कडवी बातें सुन कोई कौम्मा में जाता हे तो कभी वे जिन्दगी से ही हार जाते हैं ! हमारी परवरिश और निरंतर आगे बढ़ने की भूख जो बदती जा रही है ! काश हम उन्हें जिन्दगी जीने के सही राह दिखाए , हमेशा जीतने के नहीं ! मुश्किलों से लड़ना उन्हें सिखाएं ! ताकि हारने पर मौत को गले लगाने की बजाय वे हिम्मत से नाकामयाबी का कारण तलाशें ! ताकि अगली बार दुगनी मेहनत करे की सफलता उनसे दूर ही न जा पाए !इसमें हमारे और उनके माँ- बाप का भी उतना ही महत्वपूर्ण योगदान है ! ताकि हम उनकी निस्वार्थ मुस्कुराहट उनके चेहरे पर वापिस लौटा सके ! जो आज इस आप - धापी में कंही खो गयी ! यह शायद हमारा कर्तव्य ही नहीं धर्म भी है ! मेरा नीला - गुड्डा तो मेरे जीवन साथी के रूप में बदल गया ! लेकिन आज भी कभी जब किसी खिल्लोने को देखू तब वो बहुत याद आता है !










Friday, March 26, 2010

आशाओं के संग

निरंतर चल रहा है ये कारवां, गतिमान, उत्साहित आँखों में अरमान लिए,
जिन्दगी में कुछ हासिल करने,  स्वप्न सलोनों को पूरा करने,
अपनी ही उमंगों में चलता,  मुश्किलों को चुनौती समझ उनसे जूझता,
जैसे आगे बढ़ने की होड़ में नदियों या लहरों का टकराना, उनका छिन्न-भिन्न होना,
लेकिन फिर उसी उत्साह से आगे बढ़ना, पतझड़ में फूलों का एक-एक गिरता पत्ता,
लेकिन बसंत में खिलने वाली नई कोपलों की आस लिए,
यही जीवन के हैं रंग, आशा और निराशा संग -संग ,
अंत मुश्किलों का कर सामना, सपनों को न मरने दें,
भरता जा उनमें नित नए रंग, खुशियों व नई आशाओं के संग,
आशाओं के संग ...........

माँ

बदलाव आवश्क है , इसमें कोई अतिश्योक्ति नहीं लेकिन कभी -कभी जाने अनजाने में , आगे निकलने की होड़ में , या बदलते  परिवेश के साथ अनायास ही ये शब्द मुख से निकल आते हैं , यह कुछ पंक्तिया उस महान शक्सियत के लिए जो कभी कुछ नहीं मांगती! जिसके मुख से हमारे लिए हमेशा दुआएं निकलती है ! एक बच्चा माँ की गोद  में आकर अपने सब दुःख भूल जाता है , हमारे जीवन में हमारी पहली गुरु , उसका कुरूप बालक भी उसे इस दुनिया में सबसे खूबसूरत  लगता है ! कहते हैं ना  जब परमात्मा ने इस दुनिया को बनाया  तो वे हर वक़्त हम सब के पास नहीं रह सकते थे तो एक ममता की ठंडी छांव लिए , मुख पर मधुर मुस्कान लिए, त्याग की मूर्त इस कायनात पर आई ! माँ जिसके इस शब्द में पूरी दुनिया समां जाती है ! माँ ये तुम्हारे लिए
समय बदल गया, कल जब छोटे थे कोई हमारी बात नहीं समझ पाता था ,
एक ' हस्ती ' थी जो हमारे रोने और टूटे - फूटे अल्फाजों को भी समझ जाया करती थी !
खाना बनाते वक़्त भी रस्सी हाथ में ले , झूला झुलाया करती थी,
हमारे साथ हर पल बड़ी हुई , हर मुश्किल में साथ खड़ी  हुई
आज आसानी से कह देते हैं , आप नहीं समझेंगी , रहने दीजिये ,
आज भी जब नाम तेरी बेटी का छपता है , ऐह माँ मुझे असर तेरी दुआओं का लगता है ,
आज भी अचानक उठ जाती है सोते -सोते  , जब कह दिया था माँ मुझे डर लगता है !!उस वात्सल्य मई को हमारा कोटि - कोटि अभिनन्दन ! आप सभी को माँ के लिए मनाये जाने वाले इस दिवस की  की बहुत बहुत शुभ कामनाएं ! महंगे तोहफों के साथ साथ क्यों न आज एक प्रण लिया जाये की इस माँ का आदर कर उचित सम्मान करेंगे ! इस माँ को जीवन के किसी भी क्षण  किसी का मोहताज नहीं करेंगे 

Tuesday, March 9, 2010

गुलिस्तान हमारा

मजहब नहीं सिखाता आपस में वैर रखना , हिंदी हैं हम वतन है ये हिन्दुस्तान हमारा, अनायास ही शब्द मेरे मुख से निकले जब में माई नेम इस खान देख रही थी ! यह बात शायद बहुत पुरानी हो गयी है परन्तु देखने व लिखने का मौका अभी मिला ! मीडिया हमारे लोकतंत्र का चौथा स्तम्भ है यह हम सब भली- भांति जानते है ! मिटटी को सोना बना सकता है और आकाश के तारे को शायद एक आम इन्सान ! इस फिल्म के बारे में हर व्यक्ति की अपनी राय रही होगी लेकिन में यही कहना चाहूंगी की हमारी परवर्ती दुसरे को गलत सबित और गलतियाँ निकलने की बन चुकी है ! कभी हम राजनीती तो कभी पुरे सिस्टम को दोष देते हैं लेकिन यह भूल जाते हैं की ये लोग भी हमारे जैसे हैं ! क्यों न अब शुरुआत खुद से की जाये ! इस फिल्म को खासतौर से मीडिया से जुड़े लोगों को जरुर देखना चाहिए ! हम किसी भी गलत बात को बहुत जल्दी सीखते हैं! क्यों न इस बार प्रयास कुछ अच्छे से किया जाये ! लेखक ने सही कहा है की सिर्फ दो तरह के लोग हैं अच्छे और बुरे ! मजहब चाहे कोई भी हो सभी गुरुओं , पीर, पेंग्म्ब्रों ने सच्चाई व नेकी के राह पर चलने का सबक दिया है ! लेकिन आज धर्म के नाम पर इतने झगडे , दंगे -फसाद हो रहे है ! जिनका घर बर्बाद हो गया कोई उनसे पूछे , जिस घर का जवान लड़का कौमी लडाई में चला गया उस माँ के दिल का हाल बयाँ कोई नहीं कर सकता ! जब कुछ करने का जज्बा व् नीयत भली हो अगर लक्ष्य सिर्फ दूसरों की भलाई तो शायद कभी कोई यह न देखे की सामने वाला पीड़ित किस कौम का है ! हमारा देश तो एक फूलों का रंग- बिरंगा गुलदस्ता है , जंहा तरह- तरह के सुगन्धित फुल अपनी खुशबू , व सुन्दरता को बनाये हुए हैं ! जब भी देश पर विपति आई है पूरा भारत सर्वदा एक जुट हो सामने आया है लेकिन जब भाषा , धर्म और कभी मंदिर तो कभी मस्जिद के नाम पर खून - खराबा होता है तो मानवता भी शर्मसार हो जाती है ! मीडिया को भी चाहिए कभी टी. आर . पी. की दौड़ से बाहर आकर अपना फ़र्ज़ पहचाने ! जब दो भिन्न धर्मों के लोग एक साथ दिवाली मानते है वो कवर करना शायद मुश्किल हो लेकिन एक जलती बस का सीन सारा दिन टी. वी पर चलता है ! जिससे देश के बाकि हिस्सों में बैठे लोग कभी संपर्क ना हो पाने के कारण चिंता में जान दे देते है ! यह जानकारी के लिए है , सूचना के लिए है ताकि मीलों दूर बैठे होने पर भी हम इनसे जुड़े रहें ! वंही विपत्ति आने पर यही चैनल वाले सहायता भी करते हैं ! कई मुद्दे ऐसे हैं जो मीडिया के कारण प्रकाश में आये और उन्हें न्याय मिल सका ! में फिर वही बात दोहराना चाहूंगी अच्छाई और बुरे , हर स्थान , हर वस्तु में है परन्तु अति हर चीज की बुरी है ! अत : यही गुजारिश मीडिया से भी अपनी जिम्मेदारियों को और परिपक्वता , ईमानदारी से निभाए क्योंकि कमियां शायद कई अधिक होगी लेकिन आज हम कुछ शुरुआत अच्छाई से करेंगे ! जैसे जब एक सत्तर वर्षीय बुजुर्ग को पेड़ लगता देख उसका पोता पूछता है की दादाजी इसका क्या फायदा आप तो इसके फल नहीं खा पाएंगे ! उन्होंने हसकर कहा लेकिन तुम और आने वाली कई पीड़ियाँ तो खायेंगी व इसकी छाया में विश्राम करेंगी ! जैसे की हम अपने बुजुर्गों द्वारा लगाये गए वृक्षों का इस्तेमाल करते आये हैं ! वह बच्चा भी इससे सीख लेता है की हाँ में भी आगे चलकर यह नेक कार्य अवश्य करूँगा ! अत इंसान को उसकी मानवता से पहचे नाकि रंग , धर्म व जाति से !




Sunday, February 28, 2010

उम्र नहीं , सपने रहे जंवा



सेमीनार ख़त्म हो गया था ! सबका ध्यान अब कॉफ़ी- हाउस में हो रही चाय पार्टी की तरफ था ! इन में वो लड़का भी आये हुए कुछ मेहमानों के साथ उसी और बढ़ रहा था ! उसके चहेरे की बेशर्मी देख मुझे दुःख हो रहा था ! यह वही था जो शायद कुछ देर पहले किसी के सपनो का मजाक बनाकर आया था ! ऐसे शक्सियत का जिसने शायद इस सपने के लिए अपनी पूरी जिन्दगी लगा दी ! और खुद को मार कर भी इसे जिंदा रखा! अगर किसी नौजवान ने यह सब किया होता तो कोई बड़ी उपलब्धि नहीं थी! लेकिन एक अस्सी वर्षीय बुजुर्ग नौजवान को फुर्ती से कार्य करता देख कोई भी हैरान होगा ! में बात कर रही हूँ ''पी एन शाही '' जी की जिनकी पुस्तक '' युग वरतारा'' जो एक पंजाबी नाटक की किताब है उसकी ऑडियो सी' डी जो अब बन कर तैयार हुई है ! उसकी लौन्चिंग का ( माफ़ी चाहूंगी उचित शब्द खोज नहीं पाई )! मैंने यह नोवेल नहीं पड़ा लेकिन वंहा सभा में आये सभी महानुभव ने जो टिप्पणी की उसे से यही ज्ञात हुआ की यह आज की समस्याएँ , हमारे गिरते नैतिक मूल्य , विश्वास की कहानी है ! जिसमे कुल मिला कर छ पात्र है ! जिसमे एक दरवेश , खुसरा , एक चित्रगुप्त , राजनितिक , धर्मराज , व अब तक पीड़ा भोगती आ रही महिला को एक पवित्र रूह का किरदार दिया गया ! आज शाही जी का सम्मान बहुत ही मशहूर लेखिका दिलीप कौर टिवाणा जी ने किया ! में अब अपनी बात पर आना चाहूंगी सुबह जब हम क्लास लगा रहे थे तो सेमिनार हॉल को फूलों से सजाया जा रहा था ! एक इंसान बहुत ही तलीनता से इसमें जुड़ा था ! रूचि न होने के कारन एक झलक देख चले गए लेकिन हम हैरान थे जब देखा की उन्हें सम्मान दिया जा रहा है ! तभी एक आवाज आती है की अरे यह तो वही हैं जो सुबह खुद ओह गोड़ ही इस रियल स्टार ! किसी की आँखों से आंसू झर रहे थे कोई नमस्तक था ! तभी उनका परिचय दिया गया आजादी की जंग में सब खोया , दंगो में जवान बेटा , कैंसर के मरीज हुए ! उन्हें देखकर लगा की अगर सपनों को पूरा करने का हौसला है तो हर बाधा को हटाया जा सकता है ! हर बुद्धिजीवी चाहे गायक हो या लेखक हमेशा चाहेगा की मुझे प्रसिधी मिले लोग मेरे कार्य को जाने ! बात पैसे की नहीं मान -सम्मान की है ! कितने मजबूर होंगे जब उन्होंने खुद आकर कहा की मेरा किसी ने कभी सम्मान नहीं किया ! पर मुझे दिल से ख़ुशी है की डॉ हरजिंदर वालिया ने एक प्रयास किया ! उनके इस सपने को पूरा करने का इस सब में वो मेरे साथ बैठा लड़का उनके बारे में बहुत अपशब्द बोल गया ! जिसे सुनकर शायद बाकि बैठे लोगों को भी शर्म आई ! में सिर्फ उस एक लड़के की बात नहीं कर रही ऐसा बहुत बार होता है ! लेकिन हमेशा यह याद रखे की कमियां निकलना बहुत आसान है वंहा पहुंचना बहुत मुश्किल शायद वंहा अगर हमारे परिवार का कोई सदस्य होता तो हम पर क्या गुजरती ! किसी का दर्द ,लेकिन कंही बोरियत,कंही फुसफुसाहट तो कंही आंसू !किसी के अरमानो की डोली या जिन्दगी का पसीना लेकिन कंही एक हंसी ,या किसी के सपनों का मजाक़ ! लेकिन में कन्हुगी सीख यह है तू चलता जा मंजिल जरुर मिलेगी , न घबरा , डट कर सामना आने वाली मुश्किलों का चलता जा ...........बस

Saturday, February 27, 2010

छूटते जा रहे है होली के रंग


हमारे जीवन में रंगों का बहुत महत्व है ! हर रंग अपने आप में कुछ कहता है ! हर रंग से जिन्दगी का कोई न कोई पहलु जुड़ा है ! कोई शक्ति का प्रतीक है तो कोई शांति का ! इन रंगों से अलग- अलग कहानिया भी जुडी है ! कहा जाता है की सफ़ेद चाँद की चांदनी से चुराया है और गहरा काला रात के अँधेरे से , हरा लहलहाती हरियाली का प्रतीक है तो पीला सरसों व गेंदे के फूलों का वही गुलाबी को सुन्दरता का रंग माना गया है ! हमारे आस -पास कितने ही रंग बिखरे पड़े हैं ! इनका एहसास करने और यह कामना करने , की हमेशा ये सुंदर रंग जिन्दगी को इसी प्रकार खुशहाल बनाये यह होली का त्यौहार मनाया जाता है ! इसका इतिहास जितना पुराना है उतना ही शिक्षाप्रद है ! होली से पूर्व किया जाने वाला होलिका देहन बुराई पर अच्छाई की जीत का सन्देश देता है ! प्राचीन संस्कृत कवियों से लेकर आधुनिक कवियों ने होली का बहुत गुणगान किया है ! मथुरा , वृन्दावन ,व ब्रज की होली में आज भी कृष्ण भगवान की छवि को देखा जाता है ! कंही लट्ठ मार तो कंही फूलों की वर्षा की जाती है ! हमारी संस्कृति का प्रतीक है यह त्यौहार ! होली का त्यौहार साल में एक -बार आता है ! लेकिन आज इस उत्सव का अर्थ ही बदल गया है ! एक समय था जब सब गिले - शिकवे भुलाकर एक दुसरे के गले लग जाते थे ! दुश्मन भी दोस्ती का हाथ आगे कर पुराना वैर -विरोध छोड़ देते थे ! एक दुसरे पर रंग ढाल सब गुलाल के सप्त्रंगो में रंगीन हो जाते ! लेकिन आज इसी त्यौहार के नाम पर कीचड़ , कालिक मल इसे गन्दा किया जाता ! तेज आवाज में फूहड़ , द्विअर्थी गीत चला अश्लील हरकते की जाती है ! बुजुर्गों को जो परेशानी होती वह अलग स्त्रियाँ घर से बाहर नहीं निकल सकती ! नशे किये बिना यह पूर्ण नहीं होता व शराब , चरस इत्यादि पीकर लोग आपस में झगडे करते हैं व कईं बार कोई नव-विवाहित इस दिन बेरंग हो जाती है ! किसी माँ की गोद सुनी हो जाती है ! होली के रंग अगर सद्भावना, प्रेम उमंग के हो तो अच्छे लगते हैं लेकिन अगर साम्प्रदायिकता के हो तो कहर बरसा देते है ! आज जन्हा एक तरफ रोज बेगुनाह लोग मर रहे हैं कौन मनायेगा यह होली ! इसमें क्या दोष था उनका जो बम्ब विस्फोट में मारे गए या तालिबानियों के गुस्से का शिकार हुए या वे जो रोज गरीबी से पल- पल मर रहे हैं ! अंत में सबको होली की यही मुबारक बाद देना चाहूंगी की होली शालीनता के दायरे में मनाये जिसे किसी को परेशानी न हो ! क्योंकि कल को शायद आप भी उस मजबूर की जगह हो सकते हो ! पानी व्यर्थ न बहाएं व अपने टूटे हुए रिश्तों को जोड़ने का प्रयास करे ! हर परिवार को खुशियों की होली नसीब हो लाल रंग ख़ुशी का हो ! हम खून की नहीं गुलाल की होली खेले ! क्योंकि दूसरों की जिन्दगी उजड़ने वाले शायद रंगों को भूल गए हैं ! जब रंग उनसे रुठेंगे तो वे बदरंग हो जायेंगे ! अब वक़्त है जिन्दगी के रंगों को समझने व जानने का !